वैसे तो हर एक पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण, देवी लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना का विधान है। परन्तु माघ मास भगवान विष्णु का अतिप्रिय होने से इस महीने की पूर्णिमा का महत्व और भी बढ़ जाता है। हर वर्ष माघी पूर्णिमा माघ माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसके अलावा माघ पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन वाग्देवी यानि सरस्वती के स्वरुप ललिता महाविद्या की जयंती भी है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दान-दक्षिणा का बत्तीस गुना फल प्राप्त होता है। इसलिए इसे बत्तीसी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पूजन और व्रत और कथा का श्रवण या वाचन करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है।
माघ पूर्णिमा व्रत व पूजा विधि:-
पूर्णिमा के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ़-सफाई करें।
इसके बाद गंगा स्नान करें या पानी में थोड़ा गंगा जल डालकर स्नान कर लें।
इसके बाद भगवान के सामने पूर्णिमा का व्रत रखने का संकल्प लें।
भगवान विष्णु की माता लक्ष्मी के साथ वाली तस्वीर रखें और विधि विधान से पूजन करें।
पूजा के दौरान प्रभु को पुष्प, फल, मिठाई, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित करें।
इसके बाद माघ पूर्णिमा की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
पूजन के बाद सूर्य के सन्मुख खड़े होकर जल में तिल डालकर उसका तर्पण करें।
दिन भर व्रत रखकर भगवान का मनन करें।
रात में चंद्र दर्शन करके चंद्रमा को अर्घ्य दें।
इसके बाद अपना व्रत खोलें।
पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा पढ़ना भी बेहद पुण्यदायी माना जाता है।
मान्यता है कि इससे सौ यज्ञों के समतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है।
कांतिका नगर में धनेश्वर नाम का ब्राह्मण रहता था। वो अपना जीवन निर्वाह भिक्षा लेकर करता था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी के कोई संतान नहीं थी। एक दिन ब्राह्मण की पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई, लेकिन लोगों ने उसे बांझ कहकर ताने मारे और भिक्षा देने से इनकार कर दिया। इससे वो बहुत दुखी हुई। तब किसी ने उससे 16 दिन तक मां काली की पूजा करने को कहा। ब्राह्मण दंपत्ति ने सभी नियमों का पालन करके मां काली का 16 दिनों तक पूजन किया। 16वें दिन माता काली प्रसन्न हुईं और प्रकट होकर ब्राह्मणी को गर्भवती होने का वरदान दिया। साथ ही कहा कि तुम पूर्णिमा को एक दीपक जलाओ और हर पूर्णिमा पर ये दीपक बढ़ाती जाना। जब तक ये दीपक कम से कम 32 की संख्या में न हो जाएं। साथ ही दोनों पति पत्नी मिलकर पूर्णिमा का व्रत भी रखना। ब्राह्मण दंपति ने माता के कहे अनुसार पूर्णिमा को दीपक जलाना शुरू कर दिया और दोनों पूर्णिमा का व्रत रखने लगे। इसी बीच ब्राह्मणी गर्भवती भी हो गई और कुछ समय बाद उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम देवदास रखा। लेकिन देवदास अल्पायु था। देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। काशी में उन दोनों के साथ एक दुर्घटना घटी जिसके कारण धोखे से देवदास का विवाह हो गया। कुछ समय बाद काल उसके प्राण लेने आया, लेकिन ब्राह्मण दंपति ने उस दिन अपने पुत्र के लिए पूर्णिमा का व्रत रखा था, इस कारण काल चाहकर भी उसका कुछ बिगाड़ न सका और उसे जीवनदान मिल गया। इस तरह पूर्णिमा के दिन व्रत करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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